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जीवन के विभिन्न युग

माँ से ही करनी होती है प्रार्थना। क्योंकि माँ है बच्चे की पहली गुरु। उसे पता होना चाहिए कि गुरु होकर क्या नही सिखाना। अभी तो सिखाना शब्द पर ही confusion है। teacher और गुरु में फर्क है। जो भी सोचती है या महसूस करती है, वो सब बच्चा गर्भ में absorb करता है। अक्सर माँ को पता ही नही होता कि उसने क्या सिखा दिया बच्चे को।  प्रकृति ने हर योनि, हर शरीर को आत्मनिर्भर बनाया है। सिर्फ माँ बनने के लिए स्त्री पुरुष पर निर्भर करती है।  पुरुष को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी जरूरी है कि जो वो दे रहा है, वही deliver करेगी स्त्री। society में unrest, confusion बढ़ता गया। क्योंकि एक जिम्मेदारी प्रकृति ने स्त्री और पुरुष को दी थी, की अपनी सांस ठीक से लेनी है।  स्त्री में माँ बनने की इच्छा थी, desire। और इसलिए उसकी needs भी थी, जो पूरी ना होने पर greed बनती चली गयी। कुल मिलाके जीवित प्राणी में 24 molecules यानी तत्व होते है। और सभी को balance रखना होता है जरूरी।  युगों के बारे में हम जानते हैं कि 4 युग होते है। पहला युग है सतयुग, यानी total enjoyment का युग। किसी प्रकार की कोई चिंता नही। 0 से...

कृष्ण का सफर द्वारकाधीश से कृष्णेन्द्र तक

Present यानी वर्तमान में हम या तो अपने कर्मफलों को enjoy करते हैं या कष्ट झेलते हैं।  positive attitude रखना चाहिये, ये तो बहुतो ने कहा। लेकिन reality को reject कर देना या उससे आंखे मूंद लेना कोई solution नही है समस्याओं का। अब कृष्णराज्य चल रहा है जिसमे confusion की कोई जगह नही। कृष्ण के जीवन को समझें तो कृष्ण बचपन मे कहलाये गोपाल, क्योंकि नंद के घर पले। वहाँ गाय पालने का काम होता था इसलिए कहलाये वे गो पाल। फिर कंस का वध करने के बाद उन्होंने द्वारका नगरी बसाई। और कृष्ण कहलाये द्वारकाधीश। तभी उन्होंने पृथ्वी से छल समाप्त करने का काम शुरू किया। महाभारत के युध्द की रचना हुई । उन्हीं 18 दिनों में बलराम, जो कि कृष्ण के बड़े भाई, और शेष के रूप थे, ने निश्छलता के बीज बोए। हलधर कहलाते थे बलराम।  फिर कृष्ण पहुंचे जगन्नाथ पुरी, बलराम और सुभद्रा, कृष्ण की बहन, के साथ। वहाँ पर मंदिर में मूर्ति रूप में रहे। उसके बाद nov 2019 में पूरी से दिल्ली आ गए। कालकाजी मंदिर के पास एक काली माई चौक है, जिसके 3 मील के घेरे में निष्छल टेम्पल काल सर्कल है। वही कृष्ण रहे, और अब बन चुके हैं वे कृष्णेन्द्र। ...

Confusion removed

गुरु शुक्राचार्य अश्वनीजी के guidance में कृष्णेन्द्र कथा शुरू की गई है,confusion से निकलना सिखाने के लिए। कृष्णराज्य की implementation का काम अब शुरू हो चुका है, तो हर तरह के कष्ट से निकलना अब मुमकिन है। जीवन मे तीन तरह के कष्ट होते है, एक ज्ञान की कमी, फिर बुद्धि के decision making की कमी, और ऊर्जा की कमी। इस शरीर की सीमा को समझना होगा, क्योंकि confusion से निकलने के लिए अपने शरीर को समझना जरूरी है। ब्रह्मा जी ने स्त्री को बनाया तो साथ मे वरदान दिया कि किसी भी पुरुष को बुला सकती हो। अब योग यानी जुड़ना का कांसेप्ट गायब होता गया। क्योंकि समाज में यह समझ नही आ पाई कि यह स्त्री का निर्णय है कि उसे किस से जुड़ना है यानी विवाह करना है। और confusion की layer बढ़ती चली गयी। पति की किस्मत पत्नी से जुड़ जाती है, ये त्रेता युग के युगल भगवान राम सीता के जीवन से दिखता है। क्योंकि सीताजी का योग रामजी से हो चुका था स्वयम्वर से पहले ही, और ये बात राजा जनक को नही बतायी गई। छल हुआ और यही भुगतना पड़ा राम सीता को आयु भर। पहला confusion female को कि जिसको चाहे बुला सकती है, और experimenting शुरू कर दी, दूसरा ...

कृष्णेन्द्र कथा

कृष्ण बने द्वारकाधीश, फिर जगन्नाथ और अब बने कृष्णेन्द्र। कृष्णईष्ट मंदिर में दरबार लगा कृष्णेन्द्र का 29 अक्टूबर को।  जीवन जीने की दिशा बताते हैं कबीर जी के दोहे। वे बताते है कि ज्ञान कैसे कमाना है । योग्यता कैसे बढानी है ज्ञान प्राप्त करने के लिए। अपने कर्मफलों के अनुसार ही मिलता है शरीर। बाकी सभी योनियां भोग योनि है, यानी सिर्फ भुगत सकते हैं अपने कर्मफल। मनुष्य योनि योग योनि है यानी आप decide कर सकते हैं कि आपको भुगतना कैसे है।  वेद है user manual मनुष्य योनि के लिए। यदि पढ़ना नही आया तो experimenting की तरफ मुड़ जाते है, जो कि कई बार नुकसान कर सकता है।  Technology को use करना आना चाहिए। किसने बनाई, क्यों बनाई, या कैसे, यह जानना इतना जरूरी नही है। हर physical body को use करने से पहले उसके नियम जान लेने चाहिए। जैसे 33 करोड़ देवी देवताओं के बारे में बात की जाती है।  इसे एक धर्म से जोड़कर देखा जाता है। जबकि universal नियम सभी पे लागू होते है। जैसे श्वास के नियम, सूर्य से energy रिसीव करने के नियम। किसी एक धर्म या विश्वास से जोड़कर आप technology को reject कर नही सकते। करे त...

24 molecules

प्रार्थना 24 molecules को balance में लाती है। कुल 84 लाख योनियां होती है, जिसमे से कुछ male gender की योनि होती है, कुछ female gender की। Male और female के योग से संतान होती है। हालाकिं द्रोण, जो कि कौरवो और पांडवों के teacher थे, उनके जन्म के बारे में कहा गया कि उनका जन्म दोने से हुआ था। उनके पिता ने दोने में अपने वीर्य को रखा, और द्रोण का जन्म हुआ। पुरुष भी संतान बना सकता है, चाहे तो। एक neutral gender भी है, जिसको हिजड़ा कहा गया। जैसे एक example है अम्बा का। जिसने भीष्म से विवाह करने को कहा, क्योंकि उसे भीष्म ही उठा के लाये थे स्वयंवर से। लेकिन भीष्म ना माने तो अम्बा ने तपस्या की और अगले जन्म में हिजड़ा बनके आयी शिखंडी के रूप में। तपस्या किसी भी दिशा में की जा सकती है। तपस्या यानी अपनी सारी energy को एक दिशा में लगा देना। लेकिन दिशा यदि समाज के against हो तो कष्ट और बीमारी आती हैं सारे परिवार को। बीमारियां अगले शरीर में carry forward भी हो जाती हैं। इसलिए बीमारियों से निजात पाना बहुत जरूरी है। prevention रखना है ये कोरोना काल ने बताया। क्योंकि cure यानी कि बीमारियों के आने के बाद उसक...

मेरा शुभ हो

Past writes future. भविष्य की नींव जब पड़ ही चुकी है तो वर्तमान में मेहनत क्यों करनी?  यह समझने के लिए कर्म और श्रम में अंतर समझना जरूरी है। श्रम करने के लिए ऊर्जा चाहिए होती है। शक्ति और ऊर्जा भिन्न है। शक्ति चाहिये कर्म के प्रति भक्ति रखने के लिए। अपने कर्मफल जो कमाए हुए है, वो हमें मिलता अवश्य है।  कर्म यानी बुद्धि ने जिस दिशा में निर्णय लिया, उसी के अनुसार कर्मफल निर्धारित हो जाता है। हर कर्म के लिए कर्मफल निश्चित होता है। श्रमफल vary करता है situation के अनुसार। जितना भी confusion फैला हुआ है, सिर्फ इसी कारण से, कि यह मानना नही चाहते कि कर्म का निश्चित कर्मफल है, और श्रम और कर्म में अंतर है। राजा दशरथ को confusion हुआ कि कोई जानवर है, और तुरन्त तीर चला दिया। श्रवण कुमार मारे गए। उनके रोते हुए माता पिता ने श्राप दिया दशरथ को, तुम भी पुत्र मोह में मरोगे। तब तक राजा दशरथ के कोई पुत्र नही था।  पुत्र आया, फिर वन को गया, और दशरथ पुत्र मोह में मरे।  आज का युवा वर्ग यही प्रश्न उठाता है, कि कोई भी effort क्यों करना, जब destiny पहले ही लिखी गयी है। जीवन को बिना कष्ट के बित...

Krishnaansh Katha --- Nishchhalizm

प्रार्थना करके अपने molecules (तत्वों) को balance में लाया जाता है। प्राणी 24 molecules से बनता है। 5 तत्वों से शरीर को समझना मुश्किल है। सनातन संस्कृति और सनातन धर्म अलग अलग है। धर्म यानी religion हमेशा region based होता है। जहाँ जैसे हालात है, वैसी ही परंपरा निभाई जाती है। religion अगर expansion करना चाहेगा तो खत्म हो जाएगा। देश और राष्ट्र भी अलग अलग concepts हैं। अपने राष्ट्र के प्रति निष्ठा रखनी जरूरी है। देश यानी वो स्थान जहाँ आपका जन्म हुआ है, आप पले बढ़े हैं। प्रकृति का नियम है कि कन्या की जड़ें उसके पति से जुड़ जाती है। इसीलिए परम्परा बनाई गई कि कन्या अपने पति के स्थान पर रहती है, विवाह के बाद। किसी भी कार्य के best results मिलते हैं, जब अपनी जड़ों से जुड़े रहकर उस कार्य को किया जाए। देश ही होता है अपना region और उसी से set होता है अपना religion। निश्छलिस्म universal religion है। यानी कि practical सनातनता। मनुष्य का धर्म, जन्म से पहले और मृत्यु के बाद एक ही होता है, निश्छलिस्म।  निश्छलिस्म बताता है Art of Leaving। आपको पता होना चाहिए कि आपको क्या छोड़ना है, कैसे छोड़ना है। नवजात श...